स्फटिक और पारद के उपाय

ईश्वरीय शक्ति एवं प्रकाश से भरपूर स्फटिक (Crystal) का प्रयोग सदियों से ही हमारे संत महात्मा एवं सिद्ध व्यक्ति अपनी प्राण ऊर्जा को विकसित करने तथा नकारात्मक भावनाओं, वातावरण एवं रोगों से बचने के लिए विविध तरीकों से करते रहे हैं।

एक सामान्य व्यक्ति के लिए स्फटिक हमेशा एक रहस्यमय या सामान्य पदार्थ ही बना रहा और वे इसका लाभ नहीं उठा सके परंतु हाल ही में गहन वैज्ञानिक अनुसंधानों ने व रहस्य शोधक चिकित्सकों ने सैकडों प्रयोगों से इसकी उपचारक शक्तियों, शरीर, मन एवं भावनाओं पर होने वाले आध्यात्मिक प्रभावों को बखूबी स्थापित किया है। इसी कारण स्फटिक चिकित्सा (Crystal Healing) एक अलग चिकित्सा पद्धति के रूप में फैलती जा रही है।

प्राचीन काल में लगभग 30,000 वर्ष पहले के लोग भी इसके जादुई गुणों को पहचानते थे व अपनी प्रजा के रोग निदान के लिए इसका प्रयोग करते थे। एटलान्टिस नाम की प्रसिद्ध सभ्यता के लोगों के पास 25 फीट लम्बा और 10 फीट चौड़ा विशाल क्वार्ट्ज क्रिस्टल था जिसके ऊर्जा क्षेत्र का प्रयोग करके वहाँ के लोगों की बीमारियों को ठीक किया जाता था।

यह कुदरती हरफनमौला पदार्थ दो प्राकृतिक तत्वों ऑक्सीजन व सिलिकॉन के मिश्रण से बना है जब यह दोनों तत्व गर्मी और असहाय दबाव के साथ भूगर्भ में एक साथ जुडते हैं तो प्राकृतिक स्फटिक का निर्माण होता है। प्राकृतिक स्फटिक के निर्माण में कई सौ वर्ष लग जाते हैं।

एक मेडिकल डॉक्टर भौतिक शरीर का उपचार करता है एक मनोचिकित्सक मन तथा भावों की चिकित्सा करता है और आध्यात्मिक पुरुष आत्मा का उपचार करता है लेकिन एक उपचारक को तन मन और भावनाओं तीनों को संतुलित करके उनका उपचार करना चाहिए क्योंकि मनुष्य इन तीनों का संतुलित योग है।

मानव शरीर ऊर्जा व्यवस्थाओं की श्रृंखला है और जब कोई वस्तु शरीर के किसी भी कोष को ऊर्जा पाने से रोकती है या अवरोध डालती है तो वह कोष कमजोर हो जाता है और वह मस्तिष्क को अधिक ऊर्जा भेजने के लिए संदेश देता है।

यदि मस्तिष्क उसकी प्रार्थना सुन लेता है और उसके पास जो पर्याप्त ऊर्जा होती है उसे भेज देता है तो वह कोष फिर से अपना कार्य सुचारू रूप से करने लगता है अन्यथा शरीर या उसका प्रभावित अंग बीमार पड़ जाता है। अर्थात् शरीर का सार तत्व ऊर्जा है।

स्फटिक विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं को जैविक ऊर्जा में रूपान्तरित करने और उसका विस्तार करने का कार्य करता है जिससे हमारी जैविक ऊर्जा पुनः शक्ति प्राप्त करती है और संतुलित हो जाती है। स्फटिक शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास कर प्राण शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है जिससे रोगों से लड़ने की हमारी आन्तरिक क्षमता मजबूत हो जाती है।

क्वार्ट्ज स्फटिक की प्राकृतिक ऊर्जा केवल शरीर पर ही नहीं बल्कि मन एवं भावनाओं पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं। स्फटिक वास्तव में हमारी मानसदृष्टि (Visualization) की शक्ति को बढा देता है। इसका प्रभाव हमारे मस्तिष्क रूपी कम्प्यूटर पर पड़ता है अतः इसके द्वारा शरीर और मन में रहने वाली नकारात्मक शक्ति को दूर कर उसके स्थान पर सकारात्मक शक्ति का संचार किया जाता है।

मन एवं भावनाओं के साथ-साथ शरीर के सातों चक्रों को संतुलित करके स्फटिक उनकी कार्य क्षमता का विकास करता है। क्रिस्टल व्यक्ति के चारों ओर एक शक्तिशाली सुरक्षा शक्ति का क्षेत्र लगभग 100 फीट तक बढ़ा देता है।

यह दूसरों द्वारा भेजे गए नकारात्मक विचारों के रूपों को प्रभावहीन कर देता है, इसके प्रयोग के बाद रोगियों के कमरों में जाने पर भी जहां शक्तिशाली नकारात्मक विचार होते हैं उनका कोई दुष्प्रभाव नहीं पडता ।

क्वार्ट्ज क्रिस्टल की एक अद्वितीय विशेषता यह है कि यह विचारों और निश्चयों को अपने अन्दर सोख लेता है। हर प्रकार के स्फटिक में अपनी एक अलग तरंग या कंपन होती है। एक उज्ज्वल, स्वच्छ व पवित्र स्फटिक से जो ऊर्जा निकलती है वह जैविक आभा मण्डल द्वारा शीघ्र ही ग्रहण कर ली जाती है। यह ऊर्जा जैविक आभा मंडल से प्रभावित होती है और उस पर अपना प्रभाव भी डालती है।

इसकी इसी विशेषता के कारण यह एक कुशल प्राकृतिक उपचार का कार्य करता है। जैसे ही यह किसी सजीव प्राणी, पेड़-पौधे, जीव जन्तु या वातावरण के संपर्क में आता है, यह उस प्राणी या वस्तु की प्राण ऊर्जा में सामान्य से कई गुना वृद्धि कर देता है जिसे किर्लियन फोटोग्राफी या पेण्डुलम के माध्यम से बखूबी सिद्ध किया जा सकता है।

क्वाट्ज क्रिस्टल को हाथ में पकडने या इसके शरीर के संपर्क में आने से मस्तिष्क में अत्यधिक मात्रा में अल्फा तरंगें उत्पन्न होती हैं। अपनी कल्पना शक्ति को क्रिस्टल में डालने की क्रिया का उपयोग करने से आपका मनोमस्तिष्क अल्फा तरंगों की आवृत्ति पर कार्य करने लगता है। अल्फा मनोमस्तिष्क का वह स्तर है जिस पर अवचेतन मन के कम्प्यूटर के सुझाव को ग्रहण करने की क्षमता शुरू हो जाती है। इस स्तर पर ही पुराने हानिकारक प्रोग्राम को मिटाकर सही सुझावों द्वारा उपचार की प्रक्रिया की गति को बढ़ा दिया जाता है।

दवाओं और सर्जरी के साथ स्फटिक उपचार करने से मरीज को कम समय में अधिक स्वास्थ्य लाभ मिलता है। इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पडता ।

स्वच्छ पारदर्शी क्वार्ट्ज क्रिस्टल अपने अन्दर इंद्र धनुषीय प्रकाश की किरणों को सोखने व उन्हें प्रसारित (Transmit) करने का अद्भुत कार्य करता है।

अलग-अलग रंगों जैसे लाल, हरा, नीला, बैंगनी, स्वच्छ पारदर्शी इत्यादि स्फटिक अलग अलग प्रकार के रोगियों की चिकित्सा में प्रयोग किए जाते हैं हरे स्फटिक से भौतिक शरीर, हल्के गुलाबी स्फटिक से भावनात्मक शरीर नीले लाजवर्त (Sodalite) स्फटिक (Rose Quartz ) से मानसिक उपचार और आध्यात्मिक शरीर के लिए बैंगनी स्फटिक (Amethyst) का प्रयोग किया जाता है। इनका उपयोग विभिन्न रूपों में सुविधानुसार किया जा सकता है जैसे- माला, लॉकेट, स्फटिक चक्र, श्रीयंत्र, मूर्तियाँ Crystal Balls इत्यादि।

हृदय चक्र पर लॉकेट या स्फटिक की माला के प्रयोग से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ जाती है क्योंकि यह थाईमस ग्रन्थि को बल प्रदान करती है। अपने आसपास के वातावरण में इनका प्रयोग किया जा सकता है जैसे ऑफिस में मेज पर रखकर या रोगी के बिस्तर के आसपास या तकिए के नीचे रखकर ऊर्जा शक्ति के क्षेत्र को बढाया जा सकता है।

अतः हम कह सकते हैं कि शक्तिवर्धक प्रकृति का यह अनमोल सुरक्षा कवच मन, रोग एवं भावनाओं के उद्वेग को शांत कर शरीर व मन की शिथिलता को दूर कर स्वास्थ्य लाभ देता है, आत्मविश्वास और निर्भयता प्रदान कर व्यक्तित्व को निखारता है तथा आध्यात्मिक विकास में सहयोग करता है।

स्फटिक श्री यंत्र

स्फटिक एक सामान्य प्राप्ति वाला रंगहीन तथा प्रायः पारदर्शक मिलने वाला अल्पमोली पत्थर है। यह पत्थर देखने में कांच जैसा प्रतीत होता है। सिलिका आक्साइड का एक रूप यह स्फटिक पत्थर स्वयं में विशेष आब तथा चमकयुक्त नहीं होता, लेकिन विशेष काट में काटने तथा पालिश करने पर इसमें चमक पैदा की जा सकती है। स्फटिक पत्थर से बनी विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां एवं यंत्र बनाये जाते हैं।

जिस प्रकार से नवग्रह होते हैं। ठीक उसी प्रकार से नौग्रहों की नौ प्रकार की लक्ष्मी होती हैं एवं नौ प्रकार की लक्ष्मी होती हैं। 1. आद्या लक्ष्मी 2 धान्य लक्ष्मी 3. धैर्य लक्ष्मी 4 गजलक्ष्मी 5 सन्तान लक्ष्मी 6. विजय लक्ष्मी 7 विद्या लक्ष्मी 8 धन लक्ष्मी 9. धान्य लक्ष्मी आदि ।

अनन्त ऐश्वर्य व लक्ष्मी प्राप्ति के लिए श्रीविद्या व श्रीयन्त्र का महत्त्व सर्वाधिक है। श्रीविद्या ही ललिता, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, पंचदशी और षोडशी इत्यादि नामों से विख्यात है। श्रीविद्या की साधना हेतु उसके आधारभूत श्रीयन्त्र को समझना प्रथमः अनिवार्य है।

इस श्री यन्त्र के सम्मुख आर्तभाव से श्रद्धापूर्वक श्रीसूक्त’ पढ़ने पर बहुतों को धन सम्पत्ति की प्राप्ति हुयी है। अनेक धर्मशास्त्रों में यह प्रमाण पाया गया है कि स्फटिक श्री यंत्र, दक्षिणावर्ती शंख, गोमती चक्र एवं तुलसी पत्र जिस घर में यह पांचों वस्तुयें एक साथ प्रतिष्ठित की जाती हैं और प्रतिदिन इनका पूजा एवं दर्शन किया जाता है। वहां धन और ऐश्वर्य की कभी भी कमी नहीं होती है।

स्फटिक शिवलिंग

स्फटिक शिवलिंग की साधना में सिद्धि की बात सौ प्रतिशत सत्य है। भौतिक युग में विविध क्षेत्रों में साधनारत पुरुषार्थी चमत्कारी सफलतायें पाते देखे गये हैं। जीवन तो ऐसा विलक्षण क्षेत्र है जो कि जड़ जगत के किसी मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण घटक से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है।

जड़ सीमित है, चेतन असीम और अनन्त है जड़ से केवल साधनभर पाये जा सकते हैं जबकि चेतन में तो आनन्द और उल्लास के भण्डार भरे पड़े हैं। इसकी उपासना से सैकड़ों गऊओं के दान हजारों, स्वर्ण मुद्राओं के दान तथा चारों तीर्थ का जो पुण्य मिलता है, वह फल इसके दर्शन करने से प्राप्त हो जाता है। शास्त्रकारों ने इसे साक्षात शिव कहा है।

भगवान् शिव वैष्णव, शैव, शाक्त तीनों धर्मों के लिए उपासना में श्रेष्ठ एवं सिद्धि के प्रदाता माने गये हैं। भगवान शिव के लिंग की स्थापना एवं पूजन का अत्यधिक महत्व पुराणों में वर्णित है।

शिवलिंग को अनेक धातुओं एवं काष्ठ से निर्मित किया जाता है तथा पत्थर एवं रत्नों से भी शिवलिंग का निर्माण होता है। सर्वाधिक महत्व पार्थिव शिवलिंग पारद शिवलिंग एवं स्फटिक शिवलिंग का है पार्थिव शिवलिंग मिट्टी से निर्मित किया जाता है तथा पारद शिवलिंग पारा द्रव को ठोस बनाया जाता है और शिवलिंग का आकार दिया जाता है ।

स्फटिक शिवलिंग का स्पर्श करने मात्र से इसकी दैवीय शक्ति मानव शरीर में प्रवेश कर जाती है तथा अनेक रोगों से मुक्त करता है। स्फटिक शिवलिंग पर अभिषेक करने से अन्य शिवलिंग की अपेक्षा हजारों गुना अत्यधिक फल मिलता है।

इसे निर्मित करने में अत्यन्त परिश्रम होता है। स्फटिक शिवलिंग अत्यन्त दुर्लभ है जहाँ पर इनके मन्दिर हैं वहाँ लोग दूर-दूर से दर्शन मात्र के लिए हजारों की संख्या में आते रहते हैं और निश्चित ही लाभ प्राप्त करते हैं।

स्फटिक माला

ईश्वरीय शक्ति से भरपूर स्फटिक माला का प्रयोग सदियों से हमारे ऋषि मुनि करते आ रहे हैं। इस माला के प्रभाव से नकारात्मक भावनाओं व वातावरण का शमन होता है। आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि हेतु व रोगों से बचने के लिए यह माला अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिन व्यक्तियों को रक्त संबंधी विकार होता है वह भी इसे धारण करें तो लाभ मिलता है। इसे शुक्रवार को धारण करें व मंत्र जप करें।

मंत्र : ॐ नमः शिवाय।

पारद

पारद वस्तुओं की साधना से सफलता शीघ्र प्राप्त होती है। वर्तमान भौतिक युग में विविध क्षेत्रों में साधनारत जातक चमत्कारी सफलताएं पाते देखे गये हैं। जीवन तो ऐसा विलक्षण क्षेत्र है, जो जड़ जगत के किसी मूल्यवान घटक से अधिक बहुमूल्य है।

शिव पुराण में पारे को शिव का पौरुष कहा गया है। इसके दर्शन मात्र से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि शास्त्रों में इसे अत्यंत महत्व दिया गया है।

पारद सामग्री घर, व्यवसाय, वाहन आदि में रखने से उसकी दैवीय शक्ति जातक को लाभ प्रदान करती है। घर में पारद सामग्री रखना ज्यादा उचित होता है।

पारद सामग्री का तापमान हमेशा ही न्यूनतम् होता है, जिसे छूते ही उसकी गुणवत्ता का आभास हो जाता है। पारद धातु में वे अनुपम एवं असीमित गुण पाये जाते हैं, जो मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं।

पारद से निर्मित वस्तुओं को सूक्ष्मता से देखने पर उन पर छोटे-छोटे धब्बे दिखते हैं। वजन में यह लोहे से सोलह गुना अधिक भार का होता है। पारद सामग्री को बर्फ के बीच में रखने से वह अपने भार के अनुपात में बर्फ को शोषित कर लेता है।

पारद सामग्री के निर्माण में अत्यंत कठिनाइयां आती हैं। अनेक औषधियों के संयोग, मिश्रण, घर्षण एवं विमलीकरण से इसे ठोस बनाया जाता है। ठोस होने पर इसे आलौकिक, दुर्लभ, मूल्यवान एवं शुद्ध माना जाता है।

उपयोग एवं लाभ – जैसे एक ही रोग की हजारों दवाईयां होती हैं, उसी प्रकार पारद सामग्री का उपयोग भी अनेक प्रकार से किया जा सकता है, जैसे सामग्री के सम्मुख स्तोत्र, मंत्र, कवच, पूजन, जप, अभिषेक, सामान्य रूप से नमन्, स्पर्श एवं दर्शन आदि जातक को लाभ प्रदान करते हैं। यह धातु शिव की है, अतः शिव के किसी भी मंत्र द्वारा इसकी पूजा की जा सकती है।

पारद शिवलिंग

पारद तरल होता है इसकी विशेषता यह है कि यह अपना रंग हर धातु पर चढ़ा देती है। चाहे सोना, चांदी, पीतल, तांबा आदि कोई भी धातु क्यों न हो। शिवपुराण में पारा में धातु को भगवान शिव का वीर्य कहा गया है। शास्त्रकारों ने इसे साक्षात् शिव कहा है ।

शिवलिंग का महत्त्व – शिवलिंग को अनेक धातुओं एवं काष्ठ तथा पत्थर एवं रत्नों से भी शिवलिंग का निर्माण होता है। सर्वाधिक महत्व पार्थिव शिवलिंग एवं पारद शिवलिंग का है पार्थिव शिवलिंग मिट्टी से निर्मित किया जाता है तथा पारद शिवलिंग पारा द्रव को ठोस बनाकर निर्मित किया जाता है।

स्फटिक और पारद के उपाय

पारद शिवलिंग का स्पर्श करने मात्र से अनेक रोगों से मुक्ति मिलती है। इसका अभिषेक करने से अन्य शिवलिंगों की अपेक्षा हजारों गुना अधिक फल मिलता है। इसे घर में स्थापित कर नित्य बिल्व पत्र अर्पित करने से धन की वृद्धि होती है।

पारद शिव लिंग पर पानी का असर नहीं होता। इसे धूप में देखने पर इंद्रधनुषी आभा दिखाई देती है। पारद अपने आप में सिद्ध पदार्थ माना गया है। रत्न समुच्चय में पारद शिव लिंग की महिमा का विशद उल्लेख है। इसकी आराधना से सभी रोग दूर हो जाते हैं।

पारद शिवलिंग की परख – पारद शिवलिंग का प्रत्यक्ष प्रमाण स्पर्श करने मात्र से पता चल जाता है इसका तापमान बहुत कम होता है। पारद शिवलिंग को छूने से बर्फ के समान ठण्डा और वजन में यह बहुत भारी होता है।

पिरामिड के उपाय

पिरामिड का शाब्दिक अर्थ है ‘सूच्याकार पत्थर का खंभा कुछ लोगों ने इसको पिरा (Pyra) एवं मिड (Mid) में संधि विच्छेद कर इसका अर्थ दिया है त्रिकोणाकार ऐसी वस्तु, जिसके मध्य में अग्नि ऊर्जा के स्रोत का निर्माण होता है। पिरामिड आकाश तत्व के अंतर्गत स्पेस एनर्जी (Space Energy) में आता है और उसी हिसाब से घर में आकाश तत्व और प्रकाश को बढ़ाने के लिए इसको उपयोग में लिया जाता है।

पिरामिड कभी ठोस नहीं होता। पिरामिड तो पृथ्वी पर भार है। उनका कोई महत्व नहीं। ऐसे तो बड़े-बड़े तिकोने पर्वत पृथ्वी पर खड़े हैं। उनमें कोई चमत्कार नहीं पिरामिड का असली संबंध तो अंदर के (Space) आकाश तत्व एवं उसमें प्रवाहित होने वाली ऊर्जा से है। फिर पिरामिड ज्यामितीय सिद्धांतों एवं वास्तु सिद्धांतों पर खरे उतरने चाहिए। तभी उनमें चमत्कारी शक्ति आएगी। पिरामिड के अंदर गहन शक्ति का अनुभव होता है।

पिरामिड की ऊर्जा, भूगर्भ के चारों कोनों की चार भुजा से उर्ध्वगामी होती है तथा पिरामिड का शक्ति बिंदु ऊपरी नोक की ओर बढ़ता है। उधर सूर्य की ऊर्जा पिरामिड की ऊपरी नोक से नीचे की ओर उतरती है। इस प्रकार से पिरामिड ऊर्जा भूगर्भ एवं ऊपर आकाश द्वारा दोनों ओर से संपादित होती है। आयुर्वेदिक एक्यूप्रेशर, या अन्य कोई योग, ध्यान लगाने में पिरामिड बाधक नहीं है।

यदि पिरामिड में मंत्रपूत लक्ष्मी यंत्र स्थापित किया जाए और उसे तिजोरी, गल्ले (Cash-Box) के ऊपर रखा जाए तो चमत्कारी रूप से धन की वृद्धि होती है। यदि यह कूर्मपृष्ठीय या मेरुपृष्ठीय हो, तो शत-प्रतिशत काम करता है।

पिरामिड एक अत्यंत उपयोगी यंत्र है, जो मानव के लिए हर पल हर क्षेत्र में लाभ देता है। यह किसी धर्म संप्रदाय से संबंध न रखते हुए निरंतर मानव का कल्याण करता है। इसकी उत्पति पर विचार करने के लिए भले ही हमें विश्व इतिहास के प्रारंभिक काल में लौटना पड़े, परंतु यह ध्रुव सत्य है जिसे आज चिकित्सा विज्ञान भी सहजता से स्वीकार रहा है।

पिरामिड यंत्र स्थूल या सूक्ष्म गतिविधियों को संचालित करने वाले स्नायु को ऐसा प्रभावित करता है कि वे चिकित्सा का कार्य करते हैं। यह एक ऐसी बंद अलमारी है जिसके भीतर प्रकृति ने अनेक शक्तियों को छिपा रखा है, मानव के लिए आंतरिक एवं बाह्य कार्य क्षमता प्रदान करने के साथ-साथ शरीर में विशेष प्रकार 1 की कंपन (Vibrations) पैदा करता है, इसके द्वारा मन और मस्तिष्क में निरंतर प्रसन्नता बनी रहती है।

स्वस्थ्य एवं प्रसन्न रहने के लिए पिरामिड यंत्र अति चमत्कारिक यंत्र है, जिसको वैज्ञानिक आधार प्राप्त है। इस यंत्र के उपयोग से मानव शरीर में आवश्यकतानुसार ऊर्जा प्राप्त होती है, यही इसका मूलभूत सिद्धांत है। मनुष्य का गुण, अवगुण, कार्य, रुचियां प्रायः भिन्न होती हैं लेकिन उनकी आवश्यक ऊर्जा एक जैसी ही होती है। इस कारण यह सिद्ध हो चुका है कि व्यक्ति चाहे किसी भी श्रेणी का हो उसे पिरामिड यंत्र अवश्य लाभ देगा ।

उपयोग विधि

पिरामिड का उपयोग अत्यंत सहज है जिसे आप स्वतः कर सकते हैं। सर्व प्रथम इस यंत्र को गंगा जल या पंचामृत मैं धो कर ईशान कोण की ओर किसी आधार (चौकी पर रखें तत्पश्चात इसकी सूक्ष्म पूजा (धूप दीपादि से ) कर के इसके अनेक प्रकार के लाभ हेतु उपयोग कर सकते हैं।

पिरामिड के लाभ

1. किसी भी रोग की औषधि को कुछ घंटे पिरामिड के नीचे रख दें, तत्पश्चात दवा का सेवन करने दवा का प्रभाव द्विगुणित हो जाता है।

2. इसे गले या भुजा में धारण करने से स्वतः का कम वजन आभास होता है तथा मन प्रफुल्लित रहता है।

3. किसी भी मंत्रादि का जप करने या पूजा करने के समय सम्मुख रखने से धनात्मक ऊर्जा मिलती है तथा मन एकाग्र होता है।

4. छोटा शिशु रात को सोते समय चौंकता हो या डरता हो, तो उसके विस्तर के नीचे रखने से उसे अच्छी नोंद आती है और डरावने सपने नहीं आते।

5. शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों को शिक्षण के समय पिरामिड को टेबल पर सामने रख कर अध्ययन करने से अधिक सफलता मिलती है।

6. यह पिरामिड मनुष्य को आवश्यकतानुसार 1. ब्रह्माण्डीय ऊर्जा, 2 चुम्बकीय ऊर्जा, 3. आणविक ऊर्जा को निरंतर प्रदान करता है, जिससे आप स्वस्थ्य और संतुलित रहते हैं।

बंद पिरामिड सेट

यह वास्तु सुधार में कार्य करता है चारों ओर की ऋणात्मक शक्तियों को दूर कर उसे धनात्मक शक्तियों में परिवर्तित करता है क्योंकि दैनिक जीवन में मानसिक शांति और स्फूर्ति का अनुभव करता है व्यक्ति तनावमुक्त रहता है। व्यक्ति धैर्य से कार्य करता है। कार्य से संतुष्टि मिलती है। व्यक्ति आनंददायक जीवन व्यतीत करता है। और शांति का अनुभव करता है। इसलिए इसे व्यक्ति को अपने कार्य स्थल और घर में अवश्य रखना चाहिए ।

अष्टधातु में पिरामिड

व्यक्ति को नींद न आने की अवस्था में पिरामिड यंत्र को अपने तकिये के नीचे रख कर सोना चाहिये, ऐसा करने से अच्छी नींद की अनुभूति होगी। संतुष्टि, सोचने की शक्ति, दबाव से मुक्ति मिलती है थकावट, संक्रमण और बीमारियों से छुटकारा मिलता है। ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।

व्यक्ति शक्तिपूर्ण और शुभ चिंतन करने वाले हो जाते हैं। यह पिरामिड धातु, काष्ठ, रत्न, पत्थर, सोना, चांदी, तांबा, पारा, अष्ट धातु, पंच धातु आदि से निर्मित किया जाता है। चरक तथा सुश्रुत ने स्पष्ट किया है कि औषधि लेने के अतिरिक्त, रोगों के निवारणार्थ, पारे के शिव लिंग एवं पिरामिड की उपासना अवश्य करनी चाहिए।

विशेष कर यह पिरामिड उन जातकों के लिए अधिक लाभप्रद है, जो विशेष पूजा न कर सकें। इसकी उपासना जितनी सरल है, उतनी ही अधिक लाभकारी भी है। यह पिरामिड स्थापित करने से धन की वृद्धि होती है। कार्यालय में मन अशांत एवं परेशान रहने पर इसे मेज़ के ऊपर सामने रख कर लिखने, पढ़ने आदि का कार्य करने से यह अधिक लाभ देता है। वाहन में यात्रा के समय जब सब खिड़कियां दरवाजे बंद होते हैं, तो ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में यह पिरामिड सामने रख कर यात्रा करने से ब्रह्मांडीय ऊर्जा निरंतर मिलती रहती है। फलस्वरूप यात्रा में परेशानी के बजाय, आनंद और स्फूर्ति का अनुभव होता है।

पिरामिड ब्रास

पिरामिड एक बहुत ही उपयोगी यंत्र है जो व्यक्ति के जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में मदद करता है। इसकी उत्पति पर विचार करने के लिए भले ही हमें विश्व इतिहास के प्रारंभिक काल में लौटना पड़े, परंतु यह ध्रुव सत्य है जिसे आज चिकित्सा विज्ञान भी सहजता से स्वीकार रहा है।

पिरामिड यंत्र स्थूल या सूक्ष्म गतिविधियों को संचालित करने वाले स्नायु को ऐसा प्रभावित करता है कि वे चिकित्सा का कार्य करते हैं। मानव के लिए आंतरिक एवं बाह्य कार्य क्षमता प्रदान करने के साथ शरीर में विशेष प्रकार की कंपन पैदा करता है, जिसके द्वारा मन और मस्तिष्क में निरंतर प्रसन्नता बनी रहती है।

स्वस्थ्य एवं प्रसन्न रहने के लिए पिरामिड यंत्र अति चमत्कारिक यंत्र है, जिसका वैज्ञानिक आधार प्राप्त है कि इस यंत्र के उपयोग से मानव शरीर में आवश्यकतानुसार ऊर्जा प्राप्त होती है, यही इसका मूलभूत सिद्धांत है। मनुष्य का गुण, अवगुण, कार्य, रुचियां प्रायः भिन्न होती है परंतु उनकी आवश्यक ऊर्जा एक जैसी ही होती है। इस कारण यह सिद्ध हो चुका है कि व्यक्ति चाहे किसी भी श्रेणी का हो उसे पिरामिड यंत्र अवश्य लाभ देगा।

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